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बीपीओ कॉल सेंटर में नौकरी करने से लेकर आईपीएस बनने तक का सफर, जानिए इस आईपीएस अफसर की कहानी….

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Journey of this man from BPO call center employee to becoming an IPS officer

इंटरनेट पर बहुत तेजी से सारी चीजे वाइरल हो जाती है। ऐसी ही एक प्रेरणास्रोत व्यक्ति के बारे में ट्विटर पर खुलासा हुआ है। सूरज सिंह परिहार जो कि आईपीएस ऑफिसर है उनसे ट्विटर पर यह पूछा गया कि वे 22 की उम्र में क्या करते थे। और उसी के जवाब से उनकी जीवनी पूरे सोशल मीडिया में तेजी से वाइरल ही रही है। सपने तो हर इंसान देखता है, परंतु अपने सपने वही पूरे कर पाता है, जिसने उन सपनों को साकार करने की ठानी होती है। आज हम आपको एक ऐसे ही व्यक्ति से परिचित कराने जा रहे हैं, जिनके बारे में जान कर देश के बहुत से युवाओं को प्रेरणा मिलेगी, जो भारतीय पुलिस सेवा (IPS) या भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) से जुड़ने की अभिलाषा रखते हैं।

वे व्यक्ति है, सूरज सिंह परिहार। जी हां, सूरज सिंह परिहार 2015 की बैच के आईपीएस अधिकारी हैं और इस समय वे छत्तीसगढ़ के नक्सलवाद प्रभावित जिले दंतेवाड़ा में सहायक पुलिस अधीक्षक (ASP) के रूप में तैनात हैं। हम जानते है कि नक्सलवाद हमारे देश के साथ साथ जवानों के लिए एक बहुत बड़ा खतरा है। लेकिन सूरज डटकर दंतेवाड़ा में एएसपी के रूप में कार्यरत् नक्सलवादियों से लोहा ले रहे हैं, इसी के साथ वे उन नक्सलवाद से जुड़े कई भटके हुए लोगो को सही राह पर लाने की कोशिश कर रहे है।

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आइए इनके बारे में थोड़ा और जाने। इनका जन्म उत्तर प्रदेश में जौनपुर के एक छोटे से गाँव में हुआ था। 5वीं कक्षा में पढ़ने के दौरान वे कानपुर के उप-महानगर जाजमऊ चले गए। वे पढ़ने लिखने के साथ साथ बहुत चीजों में निपुण थे। स्कूलिंग के बाद उन्होंने बीए और एमए किया। उनका सपना बचपन से ही आईपीएस ऑफिसर बनने का था लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। सूरज ने 22 वर्ष की उम्र में 2005 से 2007 तक ईएक्सएल बीपीओ में कॉल सेंटर एक्ज़ीक्यूटिव के पद पर कार्य किया। 2008 से 2012 तक उन्होंने स्टेट बैंक ऑफ महाराष्ट्र में Probationary Officer (परिवीक्षाकालीन अधिकारी) यानी PO की नौकरी की। उन्होंने नौकरी के साथ compitative exam की तैयारियाँ भी की। जिसके अंतर्गत 2012 में उन्होंने SSC की परीक्षा दी। और उनकी महेनत धीरे धीरे रंग ला रही थी, वे उत्तीर्ण हो गए। उनका सीमा एवं उत्पाद शुल्क विभाग में निरीक्षक के पद पर चयन हो गया। इसके बाद उन्होंने और कड़ी मेहनत कर UPSC की तैयारी शुरू की। 2011 में उन्होंने पहली बार यूपीएससी की परीक्षा दी, लेकिन वे अपनी सफलता से बहुत दूर थे। इसके बाद उन्होंने दोबारा प्रयास किया और 2012 में परीक्षा दी, लेकिन इस बार भी वे मेन्स परीक्षा से आगे नहीं बढ़ पाए।

अगली बार उन्होंने और कड़ी मेहनत करनी शुरू कर दी और उन्हे भारतीय राजस्व सेवा (IRS) अधिकारी बनने में सफलता मिली, लेकिन उनका लक्ष्य तो आईपीएस बनने का था तो वे उसे कैसे छोड़ सकते थे। सूरज ने 2015 में यानि चौथी बार यूपीएससी की परीक्षा दी और 189 रैंक के साथ वे सफल हुए। उनकी संघर्ष से सफलता की यह जीवनी सबके लिए प्रेरणा का स्रोत है। आज वह दंतेवाड़ा में देश के हित के लिए बहुत अच्छे से अपना फर्ज अदा के रहे है।और नक्सलियों से ना केवल लोहा ले रहे है बल्कि उन्हे सही रास्ते पर लाने की कोशिश में जुटे है। इसी उद्देश्य से उन्होंने ‘नई सुबह का सूरज’ लघु फिल्म का भी निर्माण किया है। जो नक्सलवाद की सच्ची घटनाओं पर आधारित है। इस सब के आलावा सूरज की एक उपलब्धि यह भी है कि पढ़ाई के दौरान वर्ष 2000 में सूरज ने अपने स्कूल में एक लेखन प्रतियोगिता में हिस्सा लेकर उसमे जीत हासिल की। प्रतियोगिता में सूरज ने एक सुन्दर कविता लिखी, जिसके लिए उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति कोच्चेरील रामन नारायणन के द्वारा ‘राष्ट्रीय बाल श्री पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया।

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